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मसूरी की बीना भारद्वाज ने पढ़ाया दुनिया को, 27 साल भारत में और 14 साल विदेश में गढ़ी शिक्षा की नई राह

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मसूरी। पहाड़ों की रानी मसूरी ने देश को कई प्रतिभाएं दी हैं, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने अपनी प्रतिभा और शिक्षा के जरिए सीमाओं से परे पहचान बनाई। ऐसी ही शख्सियत हैं बीना भारद्वाज, जिन्होंने अपने जीवन के करीब पांच दशक शिक्षा को समर्पित किए। मसूरी से शुरू हुआ उनका शिक्षण सफर भारत से निकलकर नाइजीरिया, बैंकॉक और मनीला तक पहुंचा। उन्होंने शिक्षक, मेंटर, वरिष्ठ शिक्षा अधिकारी और प्रिंसिपल के रूप में हजारों विद्यार्थियों को न केवल पढ़ाया, बल्कि उन्हें बेहतर इंसान और जिम्मेदार वैश्विक नागरिक बनने की प्रेरणा भी दी।
बीना भारद्वाज ने बताया कि उनके लिए शिक्षा कभी महज नौकरी नहीं रही। उनका मानना है कि “शिक्षा एक पेशा नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को संवारने का दायित्व है।” यही सोच उनके पूरे शैक्षणिक जीवन की पहचान बनी रही।
मसूरी में हुई शिक्षा, यहीं से शुरू हुआ शिक्षण का सफर
मसूरी में जन्मीं बीना भारद्वाज की प्रारंभिक शिक्षा सेंट मेरीज मेरठ और वाइनबर्ग एलन स्कूल मसूरी में हुई। शिक्षा के प्रति उनकी रुचि लगातार बढ़ती गई और उन्होंने अंग्रेजी, राजनीति विज्ञान तथा इतिहास में परास्नातक की डिग्रियां हासिल कीं। इसके साथ ही उन्होंने बीएड की शिक्षा भी प्राप्त की। शिक्षण क्षेत्र में उनका सबसे लंबा कार्यकाल मसूरी के प्रतिष्ठित वेवरली कॉन्वेंट स्कूल में रहा। भारत के सबसे पुराने बालिका विद्यालयों में शामिल इस संस्थान में उन्होंने करीब 27 वर्षों तक सेवाएं दीं। यह उनके करियर का ऐसा दौर रहा जिसने उनके शिक्षण दृष्टिकोण को मजबूत आधार दिया। वेवरली में अपने कार्यकाल को याद करते हुए बीना भारद्वाज बताती हैं कि विद्यालय का वातावरण ही ऐसा था, जहां शिक्षा के साथ अनुशासन, आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता और मानवीय मूल्यों पर जोर दिया जाता था। उन्होंने अपने सहयोगियों और वरिष्ठ शिक्षकों से भी बहुत कुछ सीखा। उनके सहकर्मियों में मिस वालेस जैसी शिक्षिका भी रहीं, जिनका संबंध प्रसिद्ध लेखक रस्किन बॉन्ड के सैनावर स्कूल के दिनों से रहा।
मसूरी से नाइजीरिया तक पहुंचा शिक्षा का सफर
भारत में 27 वर्ष की लंबी सेवा के बाद बीना भारद्वाज ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा के क्षेत्र में काम करने का निर्णय लिया। इसके बाद उनका सफर नाइजीरिया के बाउची स्टेट स्थित डब्ल्यूटीसी अज़ारे तक पहुंचा, जहां उन्होंने चार वर्ष तक सीनियर एजुकेशन ऑफिसर के रूप में काम किया। इसके बाद उन्होंने बैंकॉक के मॉडर्न इंटरनेशनल स्कूल में चार वर्ष तक सीनियर स्कूल कोऑर्डिनेटर के रूप में अपनी सेवाएं दीं। विदेश में काम करने के अनुभव ने उन्हें अलग-अलग देशों की शिक्षा पद्धतियों, संस्कृतियों और विद्यार्थियों की जरूरतों को करीब से समझने का अवसर दिया। इसके बाद उनका अगला पड़ाव फिलीपींस की राजधानी मनीला रहा, जहां उन्होंने महात्मा गांधी इंटरनेशनल स्कूल में दो वर्ष तक प्रिंसिपल के रूप में जिम्मेदारी संभाली।
मनीला में राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम से मुलाकात बनी यादगार
बीना भारद्वाज के अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक जीवन की सबसे यादगार घटनाओं में से एक 6 फरवरी 2006 की वह मुलाकात है, जब उन्हें मनीला में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम से मिलने का अवसर मिला। उन्होंने बताया कि यह मुलाकात उनके लिए केवल एक औपचारिक अवसर नहीं थी, बल्कि शिक्षा और राष्ट्र निर्माण के प्रति उनके विश्वास को और मजबूत करने वाला अनुभव था। डॉ. कलाम का व्यक्तित्व और युवाओं को लेकर उनका दृष्टिकोण उनके लिए आज भी प्रेरणादायी है।
विदेश के बाद मेरठ में स्थापित किया अपना शैक्षणिक मॉडल
अंतरराष्ट्रीय अनुभव हासिल करने के बाद बीना भारद्वाज भारत लौटीं और मेरठ में विद्या ग्लोबल स्कूल की संस्थापक प्रधानाचार्य की जिम्मेदारी संभाली। करीब चार वर्षों तक उन्होंने विद्यालय का नेतृत्व किया और अंतरराष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली को भारतीय संदर्भ से जोड़ने का प्रयास किया। उनके कार्यकाल में विद्यालय में आईबी के प्राइमरी ईयर्स प्रोग्राम सहित अंतरराष्ट्रीय स्तर की शिक्षा पद्धतियों को बढ़ावा दिया गया। उनका जोर केवल पाठ्यक्रम पूरा करने पर नहीं, बल्कि विद्यार्थियों में सोचने, सवाल पूछने, नेतृत्व करने और समस्याओं का समाधान तलाशने की क्षमता विकसित करने पर रहा।
कई नामी परिवारों की बेटियों और नई पीढ़ी को पढ़ाया
बीना भारद्वाज के शिक्षण जीवन की खास बात यह भी रही कि उनके विद्यार्थी देश और समाज के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े परिवारों से रहे। उनकी उल्लेखनीय छात्राओं में चित्रा नारायणन, जो भारत के राष्ट्रपति की बेटी हैं, राका सिन्हा, पूर्व केंद्रीय मंत्री तारकेश्वरी सिन्हा की बेटी, स्वर्गीय गुरुमाता सविंदर आनंद, पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल की बेटियां गुरप्रीत व सरूपिंदर ढिल्लों तथा बाबा हरदेव सिंह की भतीजी विशुप्रीत निरंकारी शामिल रहीं। इसके अलावा पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री एवं उत्तराखंड के पहले राज्यपाल रहे सुरजीत सिंह बरनाला के पौत्र गगनदीप बरनाला भी उनके विद्यार्थियों में रहे। इन नामों से अधिक महत्वपूर्ण उनके लिए यह रहा कि उनके विद्यार्थी आज जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी पहचान बना रहे हैं। उनका मानना है कि एक शिक्षक के लिए सबसे बड़ा पुरस्कार यही है कि उसके विद्यार्थी अच्छे इंसान और जिम्मेदार नागरिक बनें।
खेल प्रतिभा को भी दिया मंच
बीना भारद्वाज का जुड़ाव केवल शिक्षा तक सीमित नहीं रहा। उनके विद्यार्थियों में खेल और अन्य गतिविधियों में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाली प्रतिभाएं भी रहीं। मसूरी में आयोजित राष्ट्रीय स्तर की स्केटिंग प्रतियोगिताओं में वर्ष 1968 से 1971 के बीच राष्ट्रीय कलात्मक एवं पेयर स्केटिंग चौंपियन के रूप में पहचान बनाने वाली प्रतिभा का भी उनके शिक्षण जीवन से जुड़ाव रहा।
सिविल सर्विस परीक्षा पास की, फिर भी नहीं चुना प्रशासनिक करियर
बीना भारद्वाज के व्यक्तित्व का एक और दिलचस्प पहलू यह है कि उन्होंने सिविल सर्विसेज (सेंट्रल सर्विसेज) परीक्षा भी उत्तीर्ण की, लेकिन अंततः प्रशासनिक सेवा में जाने के बजाय शिक्षा के क्षेत्र को अपना जीवन समर्पित करने का निर्णय लिया। उनके अनुसार, उनके लिए शिक्षा के माध्यम से समाज और देश की सेवा करना अधिक महत्वपूर्ण था। शायद यही कारण रहा कि उन्होंने प्रशासनिक पद की संभावनाओं के बजाय कक्षा और विद्यालय को अपना कार्यक्षेत्र चुना।
कई देशों के राजदूतों ने भी की शैक्षणिक नेतृत्व की सराहना
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान को कई अवसरों पर सराहा गया। बीना भारद्वाज को विभिन्न देशों के राजदूतों की ओर से उनके शैक्षणिक नेतृत्व और सेवाओं के लिए प्रशंसा पत्र भी प्राप्त हुए। उनकी यात्रा बताती है कि मसूरी जैसे छोटे पहाड़ी शहर से निकली एक शिक्षिका ने किस तरह अपने ज्ञान, अनुभव और समर्पण के बल पर अंतरराष्ट्रीय शिक्षा जगत में अपनी जगह बनाई।
‘शिक्षक का काम सिर्फ पढ़ाना नहीं, जीवन की दिशा देना है’
बीना भारद्वाज ने कहा कि आज शिक्षा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। तकनीक और आधुनिक संसाधनों ने पढ़ाई को आसान बनाया है, लेकिन शिक्षक की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। उनका मानना है कि बच्चों को केवल अच्छे अंक हासिल करने के लिए तैयार नहीं किया जाना चाहिए। उन्हें आत्मनिर्भर, संवेदनशील, अनुशासित, रचनात्मक और जिम्मेदार नागरिक बनाना शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य होना चाहिए। उनके शब्दों में, शिक्षक विद्यार्थियों के जीवन में केवल एक अध्याय नहीं लिखता, बल्कि कई बार उनकी पूरी जिंदगी की दिशा तय कर देता है। यही कारण है कि उन्होंने अपने जीवन को शिक्षा के माध्यम से भविष्य की पीढ़ियों को तैयार करने के लिए समर्पित किया।
मसूरी की गलियों से शुरू हुआ बीना भारद्वाज का यह सफर आज अंतरराष्ट्रीय शिक्षा जगत तक पहुंच चुका है। उनके लिए उपलब्धियों की सूची से ज्यादा महत्वपूर्ण वे हजारों विद्यार्थी हैं, जिन्हें उन्होंने ज्ञान, आत्मविश्वास और बेहतर भविष्य की राह दिखाई।