पर्यटन नगरी मसूरी में 1994 के बहुचर्चित मसूरी गोलीकांड 1994 से जुड़ा एक चौंकाने वाला खुलासा सामने आया है। जिस शहादत को लेकर वर्षों से आंदोलनकारी सरकार से मान्यता की मांग करते रहे, वह सम्मान दरअसल करीब 32 साल पहले ही दिया जा चुका था लेकिन इसकी जानकारी किसी को नहीं थी।
32 साल तक अनजान रहा सिस्टम
उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी परिषद के पूर्व अध्यक्ष रवींद्र जुगरान ने मसूरी में खुलासा करते हुए बताया कि मसूरी गोलीकांड में शहीद हुए तत्कालीन डीएसपी उमाकांत त्रिपाठी को भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने वर्ष 1995 में ही शहीद का दर्जा दे दिया था। हैरानी की बात यह है कि न राज्य सरकार को इसकी जानकारी थी। न पुलिस मुख्यालय को न गृह विभाग को और यहां तक कि शहीद के परिवार को भी इसकी भनक नहीं थी।
आंदोलनकारियों की लंबी लड़ाई, लेकिन सच देर से सामने आया
रवींद्र जुगराण ने बताया कि वह वर्षों से इस मांग को लेकर सरकार, मंत्रियों और पुलिस विभाग के संपर्क में रहे। हर साल 2 सितंबर को शहीद दिवस पर मुख्यमंत्री, मंत्री और विधायकों को ज्ञापन दिए गए। हाल ही में उन्होंने पुष्कर सिंह धामी से भी मुलाकात की, जिसके बाद पत्राचार शुरू हुआ। पुलिस मुख्यालय स्तर पर जांच के बाद तीन दिन पहले यह तथ्य सामने आया कि दिल्ली के चाणक्यपुरी स्थित शहीद स्तंभ में भी उमाकांत त्रिपाठी का नाम पहले से दर्ज है।
परिवार भी था अनजान
इस खुलासे के बाद जब आंदोलनकारियों ने उमाकांत त्रिपाठी की पत्नी यशोधा त्रिपाठी को यह जानकारी दी, तो वे भी इससे अनभिज्ञ थीं। यह स्थिति न केवल प्रशासनिक लापरवाही, बल्कि व्यवस्था की संवेदनहीनता को भी उजागर करती है।
अब उठी नई मांगें
इस पूरे घटनाक्रम के बाद आंदोलनकारियों ने सरकार के सामने कई मांगें रखी हैं कि मसूरी में शहीद स्थल पर उमाकांत त्रिपाठी की भव्य प्रतिमा स्थापित की जाए।उनके नाम पर सड़क या संस्थान का नामकरण किया जाए। शहीद परिवार को सरकारी सुविधाएं और सम्मान तत्काल दिए जाएं। सरकार इस लापरवाही के लिए माफी मांगे
आंदोलनकारियों की भावनाएं और आक्रोश
वरिष्ठ आंदोलनकारी जय प्रकाश उत्तराखंडी ने कहा कि उमाकांत त्रिपाठी एक ईमानदार और मृदुभाषी अधिकारी थे, जिनका आंदोलनकारियों के साथ अच्छा संबंध था। गोलीकांड के दौरान वे भी शहीद हो गए, लेकिन उन्हें उचित सम्मान नहीं मिल सका। वहीं आंदोलनकारी मंच के अध्यक्ष देवी गोदियाल ने इसे सरकार के आंदोलनकारियों के प्रति उपेक्षापूर्ण रवैये का उदाहरण बताया।
व्यवस्था पर सवाल, खुशी भी और पीड़ा भी
इस खुलासे के बाद आंदोलनकारियों में एक ओर खुशी है कि उनके साथी को शहीद का दर्जा पहले ही मिल चुका था, वहीं दूसरी ओर इस बात का भी दुख है कि तीन दशक तक यह सम्मान सिर्फ कागजों में ही सीमित रहा। इस मौके पर अनिल पटवाल, कमल भंडारी, भाजपा के पूर्व मंडल अध्यक्ष मोहन पेटवाल, सतीश ढौंडियाल, अनिल गोदियाल, नरेंद्र पडियार, टीकम रावत, सोबन मेहरा, हरीश सकलानी, पुष्पा पडियार, पुष्पा पुंडीर, राधा आनंद, चंद्रकला सयाना, राजेश्वरी नेगी, खुर्शीद अहमद, एजाज अहमद आदि आंदोलनकारी मौजूद रहे।

