भूमा निकेतन का खुलासा राजनीतिक ढाल के नीचे भू-माफिया कैसे देवताओं के द्वार और आध्यात्मिक ज्ञान के रूप में हरिद्वार की पहचान कर रहे नष्ट।

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हरिद्वार। हरिद्वार की पावन भूमि, जहां सदियों से कुंभ मेला आयोजित होता रहा, अब धीरे-धीरे अपने मूल स्वरूप को खोती जा रही है। कुंभ की जमीनें महलों में बदल रही हैं और धर्मनगरी का आध्यात्मिक स्वरूप गंभीर संकट में है। भूमा निकेतन उत्तरी हरिद्वार के प्रबंधक राजेंद्र ने इस मुद्दे पर गहरी चिंता जताते हुए शासन-प्रशासन और संत समाज से तत्काल संरक्षण की अपील की है। राजेंद्र ने बताया कि उन्होंने वर्ष 1980 में पहला कुंभ देखा था। उस समय प्रसिद्ध भूमा पीठाधीश्वर की सेवा में आने के बाद उन्हें आश्रम प्रबंधन की जिम्मेदारी मिली। तब संतों के लिए पर्याप्त स्थान नहीं होता था, फिर भी सरकार छावनी के लिए जगह उपलब्ध कराती थी। देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु सीमित संसाधनों में रहकर भी आध्यात्मिक साधना करते थे। रेत के टीले और मचान बनाकर संत तपस्या करते और श्रद्धालुओं को धर्म से जोड़ते थे। भव्यता कम थी, लेकिन आध्यात्मिकता झलकती थी।

उन्होंने 1986 के कुंभ का जिक्र करते हुए कहा कि बैरागी कैंप के बाहर करीब दो किलोमीटर दूर देवरहा बाबा का मचान लगता था। आज वह क्षेत्र बहुत व्यापक हो गया है। वर्तमान में संतों और अखाड़ों को भूमि आवंटित की जा रही है, लेकिन सबसे दुखद यह है कि जिन अखाड़ों को भूमि दी गई, उन्होंने उसे संरक्षित नहीं किया। पहले अलग-अलग अखाड़ों को आवंटित भूमि आज महलों में बदल चुकी है। लोगों ने अप्रत्यक्ष रूप से इन जमीनों को हड़प लिया, लेकिन न सरकारों ने ध्यान दिया और न ही संतों ने इसके संरक्षण की चिंता की। राजेंद्र ने चिंता जताते हुए कहा कि सप्तऋषि क्षेत्र में पहले नदी किनारा पूरी तरह खाली रहता था, आज बांध और नदी के बीच फ्लैट बनकर तैयार हो गए हैं। जहां कभी कुंभ मेला भरता था, आज वहां भव्य महल खड़े हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि कई कब्जे राजनीतिक लोगों के प्रश्रय में हुए हैं। सिंचाई विभाग (उत्तर प्रदेश) की अनदेखी और उत्तराखंड शासन की निष्क्रियता के कारण धर्मनगरी का स्वरूप बर्बाद किया जा रहा है। उन्होंने कहा, “अगर इसी तरह विकास के नाम पर अवसंरचनाओं का विस्तार होता रहा तो आने वाले कुंभ मेलों में दुर्व्यवस्था का सामना करना पड़ेगा।” कई जगहों पर अब अवैध कारोबार हो रहे हैं, जहां कभी धर्म और आध्यात्म का बोलबाला था। प्रबंधक राजेंद्र ने शासन-प्रशासन के साथ-साथ संत समाज से भी अपील की है कि वे हरिद्वार के पावन स्वरूप को बचाने के लिए तत्काल कदम उठाएं। उन्होंनेकहा, “धर्मनगरी को बचाना सिर्फ सरकार का काम नहीं, बल्कि संतों और समाज का भी दायित्व है। यह चिंता हरिद्वार के पुराने संतों और कुंभ परंपरा के जानकारों में बढ़ती जा रही है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य के कुंभ मेले आध्यात्मिकता से ज्यादा व्यावसायिकता का प्रतीक बनकर रह जाएंगे।