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उत्तराखंड हाईकोर्ट परिसर की वन भूमि योजना को झटका

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नैनीताल/हल्द्वानी। उत्तराखंड हाईकोर्ट को नैनीताल से हल्द्वानी शिफ्ट करने की योजना को एक बार फिर झटका लगा है। हल्द्वानी के लामाचौड़ ब्लॉक में हाईकोर्ट का स्थायी परिसर बनाने के लिए 30 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि के उपयोग का प्रस्ताव क्षेत्रीय अधिकार प्राप्त समिति (आरईसी) ने खारिज कर दिया है। समिति ने साफ कहा कि प्रस्तावित परियोजना के लिए उपयुक्त गैर-वन भूमि के विकल्पों की पर्याप्त तलाश नहीं की गई। राज्य सरकार और संबंधित कार्यदायी एजेंसी को गैर-वन भूमि पर परियोजना स्थापित करने की संभावना तलाशने के निर्देश दिए गए हैं। यह फैसला 16 अक्टूबर 2026 की आरईसी बैठक के कार्यवृत्त में दर्ज है। वन भूमि हस्तांतरण से संबंधित ऑनलाइन प्रस्ताव संख्या FP/UK/OTHERS/591255/2026 लोक निर्माण विभाग की ओर से प्रस्तुत किया गया था। प्रस्ताव के तहत नैनीताल जिले के तराई केंद्रीय वन प्रभाग के अंतर्गत लामाचौड़ क्षेत्र में हाईकोर्ट का स्थायी परिसर बनाने के लिए 30 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि मांगी गई थी।

दूसरी बार खारिज हुआ हाईकोर्ट शिफ्टिंग का प्रस्ताव
आदर्श के अनुसार हाईकोर्ट को शिफ्ट करने के लिए पहले भी वन भूमि का प्रस्ताव भेजा गया था। गौला पार, हल्द्वानी में 30 हेक्टेयर से अधिक भूमि से जुड़े पुराने प्रस्ताव संख्या FP/UK/OTHERS/435756/2023 को आरईसी ने 24 जनवरी 2024 की बैठक में खारिज कर दिया था। उस प्रस्ताव को गैर-स्थल-विशिष्ट यानी नॉन-साइट-स्पेसिफिक होने के आधार पर अनुपयुक्त माना गया था। पुराने प्रस्ताव में 4,238 पेड़ों की कटाई का प्रावधान था। साथ ही, उसमें आवासीय निर्माण भी शामिल था। नए प्रस्ताव में पेड़ों की संख्या घटकर 123 बताई गई और हाईकोर्ट प्रतिनिधि ने समिति को बताया कि इस परियोजना में आवासीय निर्माण नहीं किया जाएगा। इसके बावजूद समिति ने नए प्रस्ताव को भी मंजूरी नहीं दी।

30 हेक्टेयर जंगल में 123 पेड़ चिह्नित
प्रस्ताव के अनुसार, लामाचौड़ में जिस 30 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि को हाईकोर्ट परिसर के लिए चिह्नित किया गया था, वहां 123 पेड़ दर्ज किए गए हैं। इनमें 75 सागौन, 19 कुकाट यानी मिश्रित प्रजातियां, नौ यूकेलिप्टस, चार रोहिणी, तीन बेल, तीन पीपल और अन्य प्रजातियों के पेड़ शामिल हैं। दस्तावेज में इस वन क्षेत्र की क्राउन डेंसिटी 0.4 और इको-क्लास श्रेणी-III दर्ज है। वन भूमि के शुद्ध वर्तमान मूल्य (एनपीवी) के रूप में 3.68 करोड़ रुपये से अधिक की राशि आंकी गई है। इसके अलावा, 60 हेक्टेयर भूमि पर प्रतिपूरक वनीकरण की योजना का उल्लेख है, जिसके लिए करीब 3.46 करोड़ रुपये का वित्तीय प्रावधान दर्ज किया गया है। हालांकि, समिति की आपत्ति केवल पेड़ों की कटाई या वन भूमि की लागत तक सीमित नहीं रही। उसके सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या हाईकोर्ट परिसर के लिए गैर-वन भूमि का कोई उपयुक्त विकल्प तलाशा गया है।

एक ही तहसील में गैर-वन भूमि उपलब्ध, फिर जंगल क्यों?
बैठक में समिति के सदस्यों ने सवाल उठाया कि जब उसी तहसील में प्रतिपूरक वनीकरण के लिए 13.495 हेक्टेयर और सात हेक्टेयर गैर-वन भूमि चिह्नित की गई है, तो हाईकोर्ट परिसर के लिए उपयुक्त गैर-वन भूमि क्यों नहीं तलाश की गई। कार्यदायी एजेंसी ने जिला प्रशासन के उस प्रमाणपत्र का हवाला दिया, जिसमें एक ही स्थान पर 30 हेक्टेयर गैर-वन भूमि उपलब्ध नहीं होने की बात कही गई थी। लेकिन समिति इस तर्क से संतुष्ट नहीं हुई। कार्यवृत्त के अनुसार, एजेंसी यह साबित नहीं कर सकी कि वैकल्पिक गैर-वन स्थलों की पर्याप्त जांच की गई है और उपलब्ध विकल्पों पर गंभीरता से विचार किया गया है। समिति ने इसी आधार पर वन संरक्षण से जुड़े नियमों के तहत प्रस्ताव खारिज कर दिया और गैर-वन भूमि पर परियोजना स्थापित करने की संभावना तलाशने को कहा।

हाथी कॉरिडोर को लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं
बैठक में प्रस्तावित स्थल के हाथी कॉरिडोर में आने या न आने को लेकर भी सवाल उठा। वन विभाग ने स्पष्ट किया कि इस संबंध में स्थिति का सत्यापन किया जाना जरूरी है। यानी दस्तावेज में वन्यजीव कॉरिडोर की स्थिति को लेकर अंतिम पुष्टि नहीं थी। इसके अतिरिक्त, समिति ने परियोजना के विस्तृत लेआउट, निर्माण के विभिन्न हिस्सों के लिए भूमि के बंटवारे, वन विभाग के आवश्यक प्रमाणपत्रों और वैकल्पिक स्थलों के परीक्षण से संबंधित कमियां भी दर्ज कीं। प्रस्ताव में निर्माण के लिए जी+7 मंजिला भवन, पार्किंग और खुले स्थानों की योजना बताई गई थी।

हाईकोर्ट ने बताई शिफ्टिंग की जरूरत
बैठक में हाईकोर्ट के प्रतिनिधि ने नैनीताल स्थित मौजूदा परिसर में जगह की कमी का मुद्दा उठाया। समिति को बताया गया कि वर्ष 2010 में लंबित मामलों की संख्या करीब चार हजार थी, जो अब बढ़कर 64 हजार से अधिक हो गई है। नैनीताल में पर्यटकों की भीड़, यातायात जाम और मुकदमों से जुड़े लोगों के लिए आवास की ऊंची लागत को भी शिफ्टिंग के पक्ष में रखा गया। लेकिन समिति ने माना कि परियोजना की जरूरत बताना अपने आप में आरक्षित वन भूमि के इस्तेमाल को उचित ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं है। गैर-वन भूमि के विकल्पों की तलाश और उनके परीक्षण का ठोस आधार प्रस्तुत करना जरूरी है।

अब सरकार के सामने विकल्प तलाशने की चुनौती
आरईसी के निर्णय से फिलहाल लामाचौड़ की प्रस्तावित 30 हेक्टेयर वन भूमि पर हाईकोर्ट परिसर बनाने का रास्ता बंद हो गया है। हालांकि, यह फैसला अपने आप में हाईकोर्ट की शिफ्टिंग योजना को पूरी तरह समाप्त नहीं करता। समिति ने राज्य सरकार और संबंधित एजेंसी को उपयुक्त गैर-वन भूमि तलाशने का निर्देश दिया है।