हाइड्रोजियोलॉजिकल अध्ययन से उत्तराखंड में नदी संरक्षण अभियान को मिलेगी नई वैज्ञानिक दिशा

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देहरादून। उत्तराखंड में लगातार बढ़ रहे जल संकट, कंक्रीट के विस्तार और ग्लोबल वार्मिंग के कारण दम तोड़ते जल स्रोतों को बचाने के लिए राज्य सरकार ने अब तक की सबसे बड़ी और वैज्ञानिक पहल शुरू की है। प्रदेश की सूख रही 13 महत्वपूर्ण नदियों को नया जीवन देने के लिए 'स्प्रिंग एंड रिवर रिजूवनेशन अथॉरिटी' ने एक बेहद महत्वाकांक्षी एक्शन प्लान तैयार किया है। इस ऐतिहासिक मुहिम के तहत 'वन डिस्ट्रिक्ट-वन रिवर' (एक जिला-एक नदी) की तर्ज पर राज्य के सभी 13 जिलों से ऐसी एक-एक नदी का चयन किया गया है, जिनका जल प्रवाह पिछले कुछ वर्षों में तेजी से घटा है। इस महा-अभियान की सबसे खास बात यह है कि नदियों के सूखने के कारणों का पता लगाने और उन्हें दोबारा सदानीरा (हमेशा बहने वाली) बनाने की जिम्मेदारी किसी सामान्य एजेंसी को नहीं, बल्कि देश और दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर के वैज्ञानिक संस्थानों को सौंपी गई है।

वैज्ञानिक आधार पर विस्तृत रिपोर्ट और हाइड्रोजियोलॉजिकल ढांचा तैयार करने के लिए 'सारा' ने देश के शीर्ष तकनीकी और पर्यावरण संस्थानों को अलग-अलग जिलों की कमान सौंपी है।  जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान: अल्मोड़ा की जटा गंगा, बागेश्वर की गरुड़ गंगा और पिथौरागढ़ की पूर्वी रामगंगा का अध्ययन करेगा। नैनीताल की ऐतिहासिक शिप्रा नदी और चंपावत की गौड़ी नदी के पुनर्जीवन का तकनीकी खाका खींचेगा। ऊधमसिंह नगर की फीका नदी पर भी अर्थ साइंस विशेषज्ञों के साथ यह संस्थान संयुक्त काम करेगा। पौड़ी जिले की नयार पूर्वी व नयार पश्चिमी और टिहरी-देहरादून की जीवनरेखा मानी जाने वाली सोंग नदी का वैज्ञानिक विश्लेषण करेगा। चमोली की चंद्रभागा नदी और रुद्रप्रयाग की पुनार नदी के कैचमेंट एरिया का अध्ययन करेगा। उत्तरकाशी की कमल गंगा पर अपनी रिपोर्ट देगा। हरिद्वार की पथरी नदी के इको-सिस्टम और जल प्रवाह का बारीकी से अध्ययन करेगा। इस परियोजना में शामिल विशेषज्ञ केवल नदी के जल प्रवाह का सतही अध्ययन नहीं करेंगे। वैज्ञानिकों की टीमें नदी के उद्गम स्थल से लेकर उसके जलग्रहण क्षेत्र, भूजल पुनर्भरण की स्थिति, वर्षा जल संचयन की संभावनाओं और नदी के आसपास मौजूद पारंपरिक तालाबों, प्राकृतिक झरनों (नौलों-धारों) तथा झीलों का भी गहन विश्लेषण करेंगी। इसका मूल उद्देश्य यह समझना है कि आखिर किस मानवीय या प्राकृतिक बाधा के कारण नदी का दम घुट रहा है। संस्थानों द्वारा विस्तृत तकनीकी और व्यावहारिक रिपोर्ट सौंपने के बाद जिला स्तरीय समितियां इनका तकनीकी और वित्तीय परीक्षण करेंगी। इसके बाद फाइनल प्रस्ताव 'सारा' मुख्यालय को भेजा जाएगा। व्यवस्था के अनुसार  मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली उच्च स्तरीय समिति के समक्ष मंजूरी और बजट के लिए रखे जाएंगे। संबंधित विभाग के निर्धारित सचिव स्तर पर ही स्वीकृत किए जा सकेंगे, ताकि काम में कोई देरी न हो। इस योजना को फाइलों से निकालकर धरातल पर कामयाब बनाने के लिए सरकार ने अगले 10 वर्षों तक सतत मॉनिटरिंग (निगरानी) की व्यवस्था की है। 'सारा' के जिला स्तर के विशेषज्ञ एक दशक तक लगातार यह जांचेंगे कि वैज्ञानिक उपायों का नदी के जल प्रवाह और भूजल स्तर पर क्या असर पड़ा है। इसके साथ ही, इस पूरे अभियान में स्थानीय ग्रामीणों, महिला स्वयं सहायता समूहों और युवाओं की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी। कैचमेंट एरिया में जल संरक्षण के लिए बनने वाली संरचनाओं, वृक्षारोपण और तालाबों के निर्माण से पहाड़ों में स्थानीय स्तर पर बड़े पैमाने पर रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। 'सारा' के जियो हाइड्रोलॉजिस्ट शिवेंद्र प्रताप सिंह के मुताबिक, इस तरह के हाइड्रोजियोलॉजिकल अध्ययनों से भविष्य के अधिकारियों और वन सेवा के प्रशिक्षुओं को भी जलधाराओं के संरक्षण की वैज्ञानिक समझ विकसित करने में बड़ी मदद मिल रही है। निश्चित रूप से, यदि यह प्रयास सफल रहा, तो उत्तराखंड की सूखी नदियां एक बार फिर कल-कल कर बह उठेंगी।