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बसंती बिष्ट के जागरों से गूंजा मसूरी, 12 साल बाद लौटे शरदोत्सव की पहली शाम बनी लोक संस्कृति के नाम

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श्रीकृष्ण, सेम नागराज और आंछरी के जागरों से पहाड़ की आस्था को मंच पर किया जीवंत

मसूरी। करीब 12 साल बाद लौटे मसूरी शरदोत्सव की शाम किसी आधुनिक स्टार नाइट से नहीं, बल्कि पहाड़ की सदियों पुरानी लोकआस्था और जागर परंपरा से शुरू हुई। टाउन हॉल में पद्मश्री लोकगायिका बसंती बिष्ट ने अपने पारंपरिक अंदाज में जागरों की प्रस्तुति देकर उत्तराखंड की लोक संस्कृति को मंच पर जीवंत कर दिया। उनकी सशक्त आवाज में गूंजे जागरों ने दर्शकों को संगीत के साथ-साथ पहाड़ की आस्था और लोकविश्वास से भी जोड़ दिया। नगर पालिका परिषद मसूरी की ओर से आयोजित शरदोत्सव-2026 की पहली सांस्कृतिक संध्या में बसंती बिष्ट और उनकी टीम ने भगवान श्रीकृष्ण, सेम नागराज और आंछरी सहित विभिन्न जागरों की प्रस्तुति दी। जैसे-जैसे जागरों की धुन आगे बढ़ी, टाउन हॉल का माहौल भक्तिमय होता चला गया। दर्शक शांत भाव से उनकी प्रस्तुति सुनते रहे और तालियों के माध्यम से कलाकारों का उत्साह बढ़ाते रहे। बसंती बिष्ट की प्रस्तुति की खासियत यह रही कि उन्होंने जागर को महज गीत के रूप में प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि इसके पीछे छिपी पहाड़ की आस्था, देवी-देवताओं के प्रति विश्वास और लोक परंपराओं को भी अपनी गायकी के माध्यम से सामने रखा। उनकी आवाज में पहाड़ की मिट्टी की खुशबू और लोकजीवन की गहराई साफ महसूस हुई। शरदोत्सव की पहली शाम में उनकी प्रस्तुति ने यह भी दिखाया कि उत्तराखंड की लोकसंस्कृति आज भी लोगों को उसी तरह आकर्षित करती है, जैसे वह पीढ़ियों से पहाड़ के गांवों में लोगों के जीवन का हिस्सा रही है। पालिका अध्यक्ष मीरा सकलानी ने कहा कि शरदोत्सव का उद्देश्य केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है। उत्तराखंड की लोककला, संस्कृति और परंपराओं को देश-दुनिया से आने वाले पर्यटकों और खासकर नई पीढ़ी तक पहुंचाना भी आयोजन की प्राथमिकता है। उन्होंने कहा कि लंबे अंतराल के बाद शरदोत्सव की वापसी के साथ प्रयास किया गया है कि कार्यक्रमों में पहाड़ की संस्कृति और स्थानीय विरासत को प्रमुख स्थान मिले। उन्होंने कहा कि बसंती बिष्ट जैसी कलाकारों की प्रस्तुति युवाओं को अपनी लोक परंपराओं से जोड़ने का माध्यम बन सकती है। आधुनिक दौर में जब लोकसंस्कृति के कई रूप धीरे-धीरे पीछे छूट रहे हैं, ऐसे आयोजनों के जरिए उन्हें मंच देना जरूरी है। कार्यक्रम में स्थानीय लोगों के साथ बड़ी संख्या में पर्यटक भी मौजूद रहे। बाहरी राज्यों से मसूरी पहुंचे पर्यटकों के लिए बसंती बिष्ट की जागर प्रस्तुति उत्तराखंड की संस्कृति को करीब से जानने का अलग अनुभव रही। शरदोत्सव की पहली शाम ने पर्यटन और संस्कृति के रिश्ते को भी मजबूत किया। बसंती बिष्ट की प्रस्तुति के साथ शरदोत्सव की शुरुआत ने यह संदेश दिया कि मसूरी में लौटे इस उत्सव की पहचान केवल रंगारंग कार्यक्रमों तक सीमित नहीं होगी, बल्कि पहाड़ की लोकधरोहर, आस्था और संस्कृति भी इसके केंद्र में रहेगी।