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मसूरी में नंदा की कैलाश विदाई देख भावुक हुए दर्शक, शरदोत्सव में जीवंत हुई 12 वर्ष में होने वाली राजजात की लोकगाथा

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गढ़वाल टैरेस पर नंदा देवी राजजात की नृत्य नाटिका ने बांधा समां, डोली लेकर शहीद स्थल पहुंचे कलाकार

मसूरी। शरदोत्सव-2026 के दूसरे दिन गढ़वाल टैरेस पर उत्तराखंड की धार्मिक आस्था और लोकपरंपरा से जुड़ी नंदा देवी राजजात की मनमोहक नृत्य नाटिका प्रस्तुत की गई। 12 वर्ष में एक बार आयोजित होने वाली मां नंदा की राजजात की लोकगाथा और कैलाश विदाई के मार्मिक प्रसंगों का मंचन देखकर दर्शक भावुक हो उठे। कलाकारों ने गीत, संगीत, नृत्य और अभिनय के माध्यम से मां नंदा की यात्रा को जीवंत कर दिया। प्रस्तुति के दौरान स्थानीय लोगों के साथ पर्यटक भी मां नंदा के गीतों पर थिरकते नजर आए। कार्यक्रम का आयोजन शरदोत्सव के तहत किया गया। कार्यक्रम संयोजक अनिल गोदियाल और निर्देशक हेमंत बुटोला के निर्देशन में कलाकारों ने नंदा देवी राजजात की लोकगाथा को मंच पर प्रस्तुत किया। नृत्य नाटिका में मां नंदा को उत्तराखंड की बेटी और बहन के रूप में दर्शाते हुए उनके मायके से कैलाश स्थित ससुराल की ओर विदाई के प्रसंग को प्रमुखता से दिखाया गया। अनिल गोदियाल ने बताया कि नंदा देवी राजजात उत्तराखंड की सबसे महत्वपूर्ण लोकधार्मिक परंपराओं में शामिल है। इसे मां नंदा की मायके से कैलाश विदाई की यात्रा के रूप में देखा जाता है। लोकमान्यता के अनुसार मां नंदा उत्तराखंड के लोगों की आराध्य देवी होने के साथ ही यहां की बेटी भी हैं। इसी भाव के साथ राजजात में मां नंदा को मायके से विदा कर उनके ससुराल कैलाश की ओर भेजा जाता है। उन्होंने बताया कि यह यात्रा सामान्य धार्मिक यात्रा से अलग अपनी विशिष्ट लोकपरंपराओं के लिए जानी जाती है। राजजात से जुड़ी लोकगाथाओं में मां नंदा के मायके आने, वहां लोगों के साथ रहने और फिर कैलाश लौटने की कथा का भावनात्मक चित्रण मिलता है। लगभग 12 वर्ष के अंतराल में होने वाली इस यात्रा में श्रद्धा, लोकविश्वास, गीत-संगीत और पहाड़ की सामूहिक संस्कृति एक साथ दिखाई देती है। गढ़वाल टैरेस पर प्रस्तुत नृत्य नाटिका में मां नंदा की कैलाश विदाई के प्रसंग ने दर्शकों को भावुक कर दिया। बेटी की विदाई की भावनाओं को लोकगीतों और अभिनय के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। मां नंदा की डोली के कैलाश की ओर प्रस्थान के दृश्य के दौरान पूरा वातावरण भावुक हो गया। अनिल गोदियाल ने कहा कि “मां नंदा हमारे लिए केवल देवी नहीं, बल्कि पहाड़ की बेटी हैं। उनकी कैलाश विदाई में पहाड़ के हर परिवार की बेटी की विदाई का भाव दिखाई देता है। हमारा प्रयास रहा कि राजजात की इसी भावना और लोकगाथा को शरदोत्सव के मंच के माध्यम से लोगों तक पहुंचाया जाए। उन्होंने कहा कि आज की पीढ़ी को अपनी लोकपरंपराओं से जोड़ना बेहद जरूरी है। नंदा देवी राजजात केवल धार्मिक आस्था की यात्रा नहीं, बल्कि उत्तराखंड की लोक संस्कृति, सामाजिक एकता और सामूहिक भावनाओं का प्रतीक भी है। नृत्य नाटिका के दौरान मां नंदा के पारंपरिक गीतों और लोकधुनों ने पर्यटकों को भी आकर्षित किया। कई पर्यटक कलाकारों के साथ लोकगीतों पर थिरकते नजर आए। इससे गढ़वाल टैरेस पर उत्तराखंड की लोकसंस्कृति का जीवंत वातावरण बन गया। कार्यक्रम के समापन को भी भावनात्मक रूप दिया गया। नंदा देवी की डोली लेकर कलाकार शहीद स्थल तक पहुंचे। वहां देश के लिए अपना बलिदान देने वाले शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। मां नंदा की डोली और शहीदों की स्मृति को जोड़ने वाला यह दृश्य शरदोत्सव की सांस्कृतिक शाम का विशेष आकर्षण रहा।अनिल गोदियाल ने कहा कि शरदोत्सव जैसे बड़े मंच पर उत्तराखंड की लोकगाथाओं और परंपराओं को प्रस्तुत करने का उद्देश्य संस्कृति को केवल मंच तक सीमित रखना नहीं, बल्कि उसे नई पीढ़ी और बाहर से आने वाले पर्यटकों तक पहुंचाना है। नंदा देवी राजजात की प्रस्तुति के जरिए मसूरी के शरदोत्सव में पहाड़ की आस्था, बेटी की विदाई का भाव और लोकसंस्कृति की समृद्ध परंपरा एक साथ दिखाई दी।