पहाड़ों की रानी मसूरी में नगर पालिका परिषद की ओर से आयोजित शरदोत्सव की चौथी शाम लोक संस्कृति के रंग में रंग गई। लोक गायिका रेशमा शाह के भक्ति गीतों से शुरू हुई सांस्कृतिक संध्या में उनके गीतों पर दर्शक जमकर झूमे। कार्यक्रम का उत्साह उस समय और बढ़ गया, जब कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी और पालिकाध्यक्ष मीरा सकलानी भी रेशमा शाह के साथ थिरकने लगे। दर्शकों ने इस पल का खूब आनंद लिया और तालियों से कलाकारों का उत्साह बढ़ाया। कार्यक्रम का शुभारंभ कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी और पालिकाध्यक्ष मीरा सकलानी ने संयुक्त रूप से किया। रेशमा शाह ने पहले भक्ति गीत प्रस्तुत किया और फिर अपने लोकप्रिय लोकगीतों से समां बांध दिया।
रेशमा शाह ने कहा कि 12 साल बाद शरदोत्सव की वापसी मसूरी के लिए बड़ी उपलब्धि है। उन्होंने बताया कि उनके अपने करियर की शुरुआत भी मसूरी के इसी मंच से हुई थी। आज जब इसी मंच से कई कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिल रहा है, तो उन्हें बेहद खुशी हो रही है।उन्होंने नगर पालिका की पहल की सराहना करते हुए कहा कि इस बार उत्तराखंड के कुमाऊं, गढ़वाल, जौनसार और अन्य क्षेत्रों के कलाकारों को एक मंच पर लाकर प्रदेश की सांस्कृतिक विविधता प्रदर्शित की गई है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड सरकार भी लोक कलाकारों को प्रोत्साहित करने की दिशा में काम कर रही है।
कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी ने कहा कि 12 साल से बंद शरदोत्सव को दोबारा शुरू करने का श्रेय पालिकाध्यक्ष मीरा सकलानी और उनकी टीम को जाता है। उन्होंने कहा कि किसी भी समाज की पहचान उसकी संस्कृति और सांस्कृतिक गतिविधियों से होती है। उत्तराखंड की समृद्ध संस्कृति में पूरी दुनिया को दिशा देने की क्षमता है। उन्होंने कहा कि मसूरी में देश-विदेश से पर्यटक पहुंचते हैं। ऐसे आयोजनों के माध्यम से उन्हें उत्तराखंड की लोक परंपराओं, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक विरासत से परिचित होने का अवसर मिलता है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में प्रदेश सरकार भी संस्कृति और धरोहर के संरक्षण के लिए लगातार प्रयास कर रही है।
पालिकाध्यक्ष मीरा सकलानी ने कहा कि पालिका बोर्ड, अधिकारियों और पूरी टीम के सहयोग से शरदोत्सव को भव्य रूप दिया गया है। आयोजन में स्थानीय लोगों और युवाओं की बढ़-चढ़कर भागीदारी इस बात का संकेत है कि नई पीढ़ी अपनी संस्कृति से जुड़ना चाहती है। उन्होंने कहा कि शरदोत्सव का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि उत्तराखंड की लोक संस्कृति, देवी-देवताओं की परंपराओं और स्थानीय कलाकारों को मंच देना भी है। उत्सव के दौरान युवाओं की सक्रिय भागीदारी से यह उद्देश्य काफी हद तक पूरा होता दिखाई दे रहा है। उन्होंने विश्वास जताया कि आने वाले वर्षों में शरदोत्सव को और बेहतर स्वरूप दिया जाएगा।

