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मसूरी एमपीजी कॉलेज के प्रांतीयकरण की राह में अड़ंगा डालने की कोशिश नाकाम, हाईकोर्ट ने याचिका की खारिज

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पालिका के प्रस्ताव को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ता के पास ही नहीं था वैधानिक अधिकार, सुनवाई के दौरान अधिवक्ता ने माना—याचिका आगे नहीं बढ़ाएंगे

मसूरी। एमपीजी कॉलेज के प्रांतीयकरण को लेकर नगर पालिका परिषद मसूरी की ओर से पारित प्रस्ताव को चुनौती देने की कोशिश को उत्तराखंड हाईकोर्ट ने करारा झटका दिया है। हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने अनुज गुप्ता बनाम उत्तराखंड राज्य व अन्य, रिट याचिका संख्या 630/2026 (M/B) पर सुनवाई करते हुए याचिका को खारिज कर दिया। अदालत के इस फैसले से नगर पालिका के उस प्रस्ताव को मजबूती मिली है, जिसके माध्यम से मसूरी के महत्वपूर्ण शिक्षण संस्थान एमपीजी कॉलेज के प्रांतीयकरण की दिशा में पहल की गई है।

पालिका की ओर से जारी प्रेस नोट के अनुसार, याचिकाकर्ता अनुज गुप्ता ने एमपीजी कॉलेज के प्रांतीयकरण के लिए नगर पालिका बोर्ड की ओर से पारित प्रस्ताव को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हालांकि, सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने स्वयं स्वीकार किया कि पालिका के उक्त प्रस्ताव को चुनौती देने के लिए याचिकाकर्ता के पास वैधानिक अधिकार (Locus Standi) नहीं है। इसके बाद याचिकाकर्ता की ओर से याचिका पर आगे जोर नहीं देने यानी ‘नॉट प्रेस्ड’ किए जाने का अनुरोध किया गया।

खंडपीठ ने इस आधार पर दो सितंबर 2026 को रिट याचिका को निरस्त कर दिया और इससे संबंधित सभी लंबित प्रार्थना पत्रों का भी निस्तारण कर दिया।

प्रांतीयकरण की कोशिश पर बार-बार सवाल खड़े करने से बढ़ा विवाद

एमपीजी कॉलेज मसूरी के प्रांतीयकरण का मामला लंबे समय से स्थानीय स्तर पर चर्चा का विषय रहा है। नगर पालिका का तर्क है कि कॉलेज के प्रांतीयकरण से संस्थान को अधिक स्थायित्व, बेहतर शैक्षणिक संसाधन और विद्यार्थियों को व्यापक सुविधाएं उपलब्ध कराने का रास्ता खुल सकता है। इसी उद्देश्य से पालिका बोर्ड ने प्रांतीयकरण की दिशा में प्रस्ताव पारित किया था।

हालांकि, पालिका के इस कदम के बाद विभिन्न स्तरों पर इसका विरोध और कानूनी अड़चनें सामने आती रही हैं। पालिका  अध्यक्ष मीरा सकलानी ने कहा कि कुछ लोग अपने निजी स्वार्थ और हितों के चलते कॉलेज के प्रांतीयकरण की प्रक्रिया में लगातार अड़ंगा लगाने का प्रयास कर रहे हैं। पालिका का कहना है कि ऐसे प्रयासों से न केवल बोर्ड के निर्णय पर सवाल खड़े करने की कोशिश हुई, बल्कि कॉलेज के भविष्य से जुड़ी प्रक्रिया को भी प्रभावित करने का प्रयास किया गया।

अब हाईकोर्ट द्वारा याचिका खारिज किए जाने के बाद पालिका को इस मामले में बड़ी राहत मिली है। हालांकि, यह भी महत्वपूर्ण है कि अदालत ने मामले में याचिका को ‘नॉट प्रेस्ड’ किए जाने के अनुरोध के बाद खारिज किया है। इसलिए इसे प्रांतीयकरण के अंतिम रूप से पूरा हो जाने के बजाय पालिका के प्रस्ताव के खिलाफ दायर इस विशेष याचिका के खारिज होने के रूप में देखा जाना चाहिए।

पालिका बोली—जनहित के फैसलों में बाधा स्वीकार नहीं

नगर पालिका परिषद का कहना है कि एमपीजी कॉलेज मसूरी की शैक्षणिक व्यवस्था और विद्यार्थियों के हितों को ध्यान में रखते हुए प्रांतीयकरण की पहल की गई है। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति या समूह व्यक्तिगत हितों के कारण प्रक्रिया को रोकने का प्रयास करता है तो उसका प्रतिकूल असर शहर के विद्यार्थियों और कॉलेज के भविष्य पर पड़ सकता है।

हाईकोर्ट के फैसले के बाद पालिका बोर्ड को उम्मीद है कि अब प्रांतीयकरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में अनावश्यक कानूनी अड़चनें कम होंगी। पालिका प्रशासन ने संकेत दिया है कि कॉलेज के हित और विद्यार्थियों के भविष्य को केंद्र में रखते हुए आगे की कार्रवाई नियमानुसार जारी रखी जाएगी।

फैसले के बाद उठे कई सवाल

हाईकोर्ट के आदेश ने जहां नगर पालिका को राहत दी है, वहीं इस पूरे प्रकरण ने यह सवाल भी खड़ा किया है कि यदि किसी प्रस्ताव से किसी व्यक्ति का प्रत्यक्ष कानूनी हित प्रभावित नहीं होता, तो उसे अदालत में चुनौती देने का अधिकार किस आधार पर दिया जा सकता है। इस मामले की सुनवाई के दौरान स्वयं याचिकाकर्ता के अधिवक्ता द्वारा वैधानिक अधिकार न होने की बात स्वीकार किए जाने से याचिका की स्थिति स्पष्ट हो गई।

पालिका के लिए यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे उसके द्वारा पारित प्रस्ताव को चुनौती देने वाली मौजूदा कानूनी कोशिश समाप्त हो गई है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि एमपीजी कॉलेज के प्रांतीयकरण की प्रक्रिया आगे किस गति से बढ़ती है और शासन स्तर पर इस प्रस्ताव पर क्या निर्णय लिया जाता है।