मसूरी में वन विभाग का बुलडोजर एक्शन, नोटिफाइड क्षेत्र में प्लॉटिंग ध्वस्त, पालिका के प्लिंथ प्रमाणपत्रों पर भी उठे सवाल

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मसूरी। पहाड़ों की रानी मसूरी में पर्यावरणीय संवेदनशील क्षेत्रों में हो रहे कथित अवैध निर्माण और प्लॉटिंग के खिलाफ वन विभाग ने बड़ी कार्रवाई करते हुए झड़ीपानी क्षेत्र में जेसीबी चलाकर कई निर्माण कार्यों को ध्वस्त कर दिया। वन विभाग की इस कार्रवाई से क्षेत्र में हड़कंप मच गया। कार्रवाई के दौरान मौके पर भारी संख्या में वन कर्मी और पुलिस बल तैनात रहा।
वन विभाग के अनुसार झड़ीपानी से कोलूखेत को जोड़ने वाले एक शॉर्टकट मार्ग के आसपास स्थित नोटिफाइड वन क्षेत्र में कुछ लोगों द्वारा बिना अनुमति प्लॉटिंग, पुश्तों का निर्माण, सड़क निर्माण और लोहे के एंगल लगाकर भूमि की घेराबंदी की जा रही थी। इसकी शिकायतें मिलने और जांच में पुष्टि होने के बाद विभाग ने मौके पर पहुंचकर निर्माण कार्यों को ध्वस्त कर दिया।
नोटिफाइड क्षेत्र में किसी भी निर्माण की अनुमति नहींः- रेंजर
मसूरी वन रेंज के रेंजर महेंद्र सिंह ने बताया कि डीएफओ मसूरी अमित कुमार के निर्देश पर यह कार्रवाई की गई है। उन्होंने कहा कि विभागीय अभिलेखों के अनुसार यह पूरा क्षेत्र नोटिफाइड फॉरेस्ट एरिया की श्रेणी में आता है, जहां किसी भी प्रकार का निर्माण प्रतिबंधित है। उन्होंने बताया कि संबंधित क्षेत्र में कोई स्वीकृत प्लान अथवा लेआउट मौजूद नहीं है, इसलिए किसी भी व्यक्ति को निर्माण की अनुमति नहीं दी जा सकती। यदि कोई निर्माण करना चाहता है तो उसे पहले भारत सरकार से आवश्यक स्वीकृति प्राप्त करनी होगी, जिसके बाद वन विभाग स्तर पर एनओसी की प्रक्रिया पर विचार किया जा सकता है।
रेंजर ने स्पष्ट किया कि वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के तहत बिना अनुमति वन भूमि पर किए जा रहे निर्माण के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने यह भी खुलासा किया कि हाल के वर्षों में जारी कुछ एनओसी की भी विभागीय स्तर पर जांच की जा रही है। यदि किसी मामले में अनियमितता पाई जाती है तो संबंधित एनओसी निरस्त करने की कार्रवाई भी की जाएगी।
अवैध खनन कर बनाई जा रही थीं प्लॉटिंग
वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार कई स्थानों पर अवैध रूप से पहाड़ी काटकर और खनन कर भूमि को समतल किया जा रहा था, जिसके बाद उसे प्लॉट के रूप में बेचा जा रहा था। विभाग का कहना है कि इस प्रकार की गतिविधियां न केवल कानून का उल्लंघन हैं बल्कि पर्यावरण और भू-स्खलन के लिहाज से भी बेहद खतरनाक हैं।
पालिका के प्लिंथ प्रमाणपत्रों पर उठ रहे सवाल
वन विभाग की इस कार्रवाई के बाद अब नगर पालिका परिषद मसूरी की कार्यप्रणाली भी सवालों के घेरे में आ गई है। स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि जिन क्षेत्रों को वन विभाग नोटिफाइड और निर्माण प्रतिबंधित बता रहा है, उन्हीं क्षेत्रों में कुछ लोगों को नगर पालिका स्तर से प्लिंथ संबंधी प्रमाणपत्र या अन्य औपचारिक दस्तावेज मिलने के दावे किए जा रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि भूमि वन विभाग के अनुसार नोटिफाइड क्षेत्र में आती है तो फिर निर्माण संबंधी प्रक्रियाओं को आगे बढ़ाने वाले दस्तावेज किस आधार पर जारी किए गए? क्या संबंधित विभागों के बीच समन्वय का अभाव है या फिर नियमों की अनदेखी कर निर्माण गतिविधियों को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा दिया जा रहा है?वन विभाग द्वारा एनओसी की जांच की बात सामने आने के बाद अब नगर पालिका और अन्य संबंधित विभागों की भूमिका को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं। सूत्रों का कहना है कि आने वाले दिनों में इस मामले में कई और खुलासे हो सकते हैं।
स्थानीय लोगों ने जताया विरोध
कार्रवाई से प्रभावित स्थानीय लोगों ने वन विभाग की कार्रवाई का विरोध किया है। उनका कहना है कि यह भूमि उनकी निजी और पुरानी पैतृक जमीन है। उन्होंने आरोप लगाया कि जब वे महीनों से पुश्ते और प्लॉटिंग का कार्य कर रहे थे तब वन विभाग ने कोई आपत्ति नहीं जताई। अब लाखों रुपये खर्च होने के बाद अचानक कार्रवाई की गई है।स्थानीय लोगों का दावा है कि संबंधित क्षेत्र नोटिफाइड वन भूमि नहीं है और उनके पास स्वामित्व से जुड़े दस्तावेज मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि यदि विभाग उनकी बात नहीं सुनता तो वे न्यायालय की शरण लेंगे।
वन विभाग की इस कार्रवाई ने मसूरी में अवैध निर्माण, प्लॉटिंग और विभागीय समन्वय को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। आने वाले दिनों में जांच रिपोर्ट और न्यायालयी प्रक्रिया इस पूरे मामले की तस्वीर और साफ कर सकती है।