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रानी लक्ष्मीबाई के अंग्रेज वकील जॉन लैंग को पुण्यतिथि पर किया याद, मसूरी से जुड़ी हैं उनकी कई ऐतिहासिक यादें

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मसूरी। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की कानूनी लड़ाई लड़ने वाले ऑस्ट्रेलियाई मूल के बैरिस्टर, लेखक और पत्रकार जॉन लैंग की पुण्यतिथि पर इतिहासकार गोपाल भारद्वाज ने उन्हें याद किया। उन्होंने कहा कि जॉन लैंग का जीवन भारत, अंग्रेजी हुकूमत और मसूरी के इतिहास से गहराई से जुड़ा हुआ है। आज भी कैमल्स बैक रोड स्थित पुराने कब्रिस्तान में उनकी कब्र इस इतिहास की महत्वपूर्ण निशानी के रूप में मौजूद है। इतिहासकार गोपाल भारद्वाज के अनुसार जॉन लैंग केवल अंग्रेज वकील नहीं थे, बल्कि ब्रिटिश शासन की नीतियों पर सवाल उठाने वाले पत्रकार और लेखक भी थे। उन्होंने भारत में रहते हुए भारतीयों के पक्ष में आवाज उठाई और ईस्ट इंडिया कंपनी की नीतियों की आलोचना की। वर्ष 1845 में उन्होंने ‘द मफसिलाइट’ नाम से अखबार शुरू किया, जिसमें तत्कालीन ब्रिटिश प्रशासन और ईस्ट इंडिया कंपनी की नीतियों पर तीखी टिप्पणियां प्रकाशित होती थीं।
रानी लक्ष्मीबाई के पक्ष में लड़ी कानूनी लड़ाई
जॉन लैंग का नाम इतिहास में सबसे ज्यादा रानी लक्ष्मीबाई से उनके संबंध के कारण दर्ज है। झांसी के उत्तराधिकार और राज्य को ईस्ट इंडिया कंपनी में मिलाने की ब्रिटिश नीति के खिलाफ रानी लक्ष्मीबाई ने कानूनी लड़ाई लड़ी थी। जॉन लैंग ने इस मामले में रानी की ओर से पैरवी की। यही वह दौर था जब लॉर्ड डलहौजी की ‘डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स’ नीति के तहत उत्तराधिकारी न होने वाले भारतीय राज्यों को ब्रिटिश शासन में मिलाया जा रहा था। लैंग ने ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ खड़े होकर रानी की कानूनी लड़ाई को आवाज दी। उनके लेखन में भी भारत और यहां के लोगों के प्रति सहानुभूति दिखाई देती थी। वह पत्रकार और लेखक होने के साथ-साथ साहित्यिक क्षेत्र में भी सक्रिय रहे और चार्ल्स डिकेंस की पत्रिका ‘हाउसहोल्ड वर्ड्स’ में भी लिखते थे।
मसूरी में बीते अंतिम दिन
भारत में लंबे समय तक रहने के बाद जॉन लैंग का मसूरी से भी गहरा संबंध बन गया। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम वर्ष मसूरी-लैंडोर क्षेत्र में बिताए और 20 अगस्त 1864 को मसूरी में उनका निधन हुआ। उस समय उनकी उम्र करीब 47 वर्ष थी। उनका अंतिम संस्कार और दफन मसूरी के कैमल्स बैक रोड स्थित कब्रिस्तान में किया गया। कई दशकों तक उनकी कब्र उपेक्षित होकर झाड़ियों और काई के बीच छिपी रही। बाद में प्रसिद्ध लेखक रस्किन बॉन्ड ने वर्ष 1964 में उनकी कब्र को खोज निकाला और जॉन लैंग की कहानी को फिर से लोगों के सामने लाया। गोपाल भारद्वाज ने कहा कि मसूरी का कैमल्स बैक रोड केवल प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है, बल्कि यहां मौजूद पुराना कब्रिस्तान ब्रिटिश काल के अनेक महत्वपूर्ण किरदारों की यादों को अपने भीतर समेटे हुए है। इसी कब्रिस्तान में जॉन लैंग के अलावा ब्रिटिश सेना से जुड़े अधिकारी और उत्तराखंड के इतिहास में चर्चित फ्रेडरिक ‘पहाड़ी’ विल्सन जैसे लोगों की कब्रें भी हैं।
अंग्रेजी राज के बीच भारतीयों के पक्ष में खड़ा एक अंग्रेज
जॉन लैंग की कहानी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह उस दौर में भारतीयों के पक्ष में आवाज उठा रहे थे, जब अंग्रेजी हुकूमत अपने राजनीतिक और प्रशासनिक प्रभाव का विस्तार कर रही थी। उनकी पत्रकारिता और कानूनी गतिविधियां उन्हें तत्कालीन सत्ता से अलग खड़ा करती थीं। इतिहासकारों के अनुसार, यही कारण है कि आज भी उनका नाम रानी लक्ष्मीबाई और भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के शुरुआती दौर से जुड़े महत्वपूर्ण विदेशी चेहरों में लिया जाता है।
गोपाल भारद्वाज ने कहा कि मसूरी में जॉन लैंग की कब्र केवल एक समाधि नहीं, बल्कि उस दौर की कहानी कहने वाला जीवंत इतिहास है, जब पहाड़ों की इस नगरी में अंग्रेज अधिकारी, लेखक, पत्रकार और सैन्यकर्मी बड़ी संख्या में आते थे। ऐसे ऐतिहासिक स्थलों को संरक्षित कर नई पीढ़ी को इनके पीछे छिपी कहानियों से परिचित कराना जरूरी है।