मसूरी में अंतर्राष्ट्रीय वरिष्ठ नागरिक दिवस पर अंबेडकर चौक से गांधी चौक तक निकाली जागरूकता रैली, संगोष्ठी में बुजुर्गों की उपेक्षा पर जताई चिंता
मोबाइल की दुनिया में अपनों से दूर हो रहे बुजुर्ग, बच्चों ने रैली निकाल दिया सम्मान का संदेश
मसूरी में अंतराश्ट्रीय वरिष्ठ नागरिक दिवस के मौके पर वक्ताओं ने कहा कि जिन बुजुर्गों ने बच्चों को उंगली पकड़कर चलना सिखाया, आज वही बुजुर्ग अपनों के बीच अकेलापन महसूस कर रहे हैं। भागदौड़ भरी जिंदगी और मोबाइल की दुनिया में परिवारों के बीच संवाद कम होने से वरिष्ठ नागरिकों की उपेक्षा बढ़ रही है। इसी संवेदनशील मुद्दे को लेकर वरिष्ठ नागरिक दिवस पर मसूरी में स्कूली बच्चों और वरिष्ठ नागरिक समिति ने जागरूकता रैली निकालकर बुजुर्गों के सम्मान और देखभाल का संदेश दिया।
म्सूरी वरिष्ठ नागरिक समिति के तत्वावधान में अंबेडकर चौक से गांधी चौक तक निकाली गई रैली में स्कूली बच्चों ने उत्साहपूर्वक प्रतिभाग किया। बच्चों ने लोगों से अपने माता-पिता, दादा-दादी और नाना-नानी का सम्मान करने तथा उनकी भावनाओं को समझने की अपील की। उन्होंने संदेश दिया कि बुजुर्ग परिवार की धरोहर और घर का सम्मान होते हैं, इसलिए उनकी देखभाल केवल जिम्मेदारी नहीं, बल्कि संस्कार भी है।
रैली के बाद लाइब्रेरी स्थित गुरुद्वारा सभागार में संगोष्ठी आयोजित की गई। इसमें वरिष्ठ नागरिकों और छात्र-छात्राओं ने बुजुर्गों के अनुभव, परिवार में उनकी भूमिका और बदलते सामाजिक परिवेश में उनके सामने आ रही चुनौतियों पर विचार रखे। इस दौरान समाजसेवा के क्षेत्र में योगदान देने वाले कई वरिष्ठ नागरिकों को सम्मानित भी किया गया।
वरिष्ठ नागरिक समिति के महामंत्री नरेंद्र साहनी ने कहा कि हर वर्ष वरिष्ठ नागरिकों के सम्मान में दिवस मनाया जाता है, लेकिन वर्तमान समय में अनेक बुजुर्ग अपने ही परिवार में अकेलापन महसूस कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में बच्चे अपने दादा-दादी और नाना-नानी से दूर होते जा रहे हैं। कई मामलों में बुजुर्गों को वृद्धाश्रम तक छोड़ दिया जाता है, जो समाज के लिए चिंताजनक और दुर्भाग्यपूर्ण है। साहनी ने कहा कि कई बुजुर्गों के पास धन-संपत्ति और जीवन की तमाम सुविधाएं हैं, लेकिन उनके पास परिवार के सदस्यों का समय और साथ नहीं है। मोबाइल और डिजिटल दुनिया में व्यस्तता इतनी बढ़ गई है कि परिवार के लोग एक-दूसरे से बातचीत तक के लिए समय नहीं निकाल पा रहे हैं। ऐसे में बुजुर्ग भावनात्मक रूप से अकेले पड़ जाते हैं। उन्होंने नई पीढ़ी से अपील की कि वे अपने बुजुर्गों के साथ समय बिताएं, उनकी बातें सुनें और उनकी जरूरतों का ध्यान रखें। उन्होंने कहा कि आज की पीढ़ी जो कुछ भी है, उसमें बुजुर्गों के संघर्ष, संस्कार और मार्गदर्शन का बड़ा योगदान है। इसलिए उनका सम्मान करना और जीवन के इस पड़ाव में उन्हें अपनापन देना हर व्यक्ति का कर्तव्य ळें संगोष्ठी में वक्ताओं ने कहा कि बुजुर्गों का सम्मान केवल एक दिन तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि परिवार और समाज में उनके अनुभवों को महत्व दिया जाना चाहिए। कार्यक्रम का उद्देश्य नई पीढ़ी में संवेदनशीलता और पारिवारिक संस्कारों को मजबूत करना रहा।

