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मसूरी शरदोत्सव की आखिरी शाम करिश्मा शाह और रुहान भारद्वाज के नाम, लोकगीतों पर झूमी मसूरी

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पहाड़ों की रानी मसूरी में 12 साल बाद आयोजित शरदोत्सव की आखिरी शाम लोक गायिका करिश्मा शाह और गायक रुहान भारद्वाज के नाम रही। दोनों कलाकारों ने अपनी शानदार प्रस्तुतियों और उत्तराखंड के लोकगीतों से ऐसा समां बांधा कि दर्शक झूमने पर मजबूर हो गए। लोक संस्कृति की मिठास, पहाड़ी सुरों की गूंज और दोनों कलाकारों की जोड़ी ने सांस्कृतिक संध्या को यादगार बना दिया। उनकी प्रस्तुतियों पर दर्शकों ने जमकर उत्साह दिखाया और लोकगीतों का आनंद लिया।करिश्मा शाह और रुहान भारद्वाज ने अपनी प्रस्तुतियों के माध्यम से उत्तराखंड की लोक संस्कृति और संगीत की खूबसूरती को मंच पर उतारा। कार्यक्रम में युवाओं की भागीदारी खास तौर पर देखने को मिली। आधुनिक संगीत के दौर में पहाड़ी लोकगीतों के प्रति युवाओं का उत्साह देखकर दोनों कलाकार भी काफी खुश नजर आए।
कार्यक्रम के दौरान करिश्मा शाह और रुहान भारद्वाज ने कहा कि मसूरी में 12 साल बाद शरदोत्सव का आयोजन होना एक अच्छी पहल है। इस बार उत्सव की खास बात यह रही कि उत्तराखंड और मसूरी के स्थानीय कलाकारों को प्रमुखता से मंच प्रदान किया गया। इससे स्थानीय प्रतिभाओं को अपनी कला दिखाने का अवसर मिला और क्षेत्र की लोक संस्कृति को आगे बढ़ाने में भी मदद मिली। उन्होंने कहा कि वे देश-विदेश में कई मंचों पर प्रस्तुति देने जाते हैं, लेकिन मसूरी में दर्शकों से मिला प्यार और उत्साह उनके लिए बेहद खास रहा। यहां के लोगों का जुड़ाव और पहाड़ी संगीत के प्रति उनका लगाव कलाकारों को नई ऊर्जा देता है।
दोनों कलाकारों ने कहा कि आज के आधुनिक दौर में युवाओं को अपनी संस्कृति और सभ्यता से जुड़ते देखना सुखद अनुभव है। पहाड़ी गीतों पर युवाओं का उत्साह इस बात का संकेत है कि नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक विरासत को न केवल अपना रही है, बल्कि उसका आनंद भी ले रही है। उन्होंने कहा कि किसी भी कलाकार के लिए इससे बड़ी खुशी नहीं हो सकती कि उसके गीतों को देश ही नहीं, विदेशों में भी श्रोता पसंद करें। उत्तराखंड के लोकगीतों को मिल रही लोकप्रियता से राज्य की सांस्कृतिक पहचान को व्यापक स्तर पर पहुंचाने में मदद मिल रही है।
करिश्मा शाह और रुहान भारद्वाज ने कहा कि उत्तराखंड के लोकगीतों को लेकर श्रोताओं का रुझान लगातार बढ़ रहा है। अब पहाड़ी संगीत की गूंज देश के विभिन्न हिस्सों के साथ विदेशों में भी सुनाई दे रही है। यह उत्तराखंड के कलाकारों और लोक संगीत के लिए सकारात्मक संकेत है। दोनों कलाकारों ने नगर पालिका प्रशासन और राज्य सरकार का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस तरह के सांस्कृतिक आयोजन भविष्य में भी होते रहने चाहिए। ऐसे मंच स्थानीय कलाकारों को प्रोत्साहित करने के साथ ही उत्तराखंड की लोक संस्कृति, परंपराओं और संगीत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाते हैं।